Saturday, October 25, 2008

दीवाली की कुछ रोशन यादें...

हर तरफ जगमगाहट है, रोशनी है, उमंग है, जोश है, तरंग है। लेकिन दिल खाली और मन उदासी से भरा क्यों। इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं था क्योंकि इसे ढ़ूंढने के लिए यादों की उस तस्वीर को झाड़ पोंछ कर सामने लाने पड़ा जिसमें कहीं ख़्वाबों की हरियाली थी तो कहीं उन्हीं ख्वाबों के टूटने से फैला पीलापन था। बड़े पापा आ रहे है, चच्चू पूरे साल भर बाद आ रहे हैं, शायद मझंले चाचा भी अबकी बार आएं। जितनी बेसब्री से हम दीवाली का इंतज़ार करते उससे कहीं ज़्यादा शिद्दत के साथ उन लोगों का भी करते जो इन खुशियों को बिनने की कोशिश में पराए हो गए। रेलगाड़ी की हर एक सीटी, बस के हर एक हार्न पर हमारा शोर भारी पड़ जाता। अबकी बार हम भी उन्हीं पटाखों को फोड़ पाएंगे जो पिछले साल दीवाली पर पड़ोस वाले हमउम्र साथियों ने फोड़े थे। अबकी बार तो जुआ खेलने के लिए पक्का 2 रुपये से ज़्यादा मिलेंगे। सफाई की धुन पर पूरा मोहल्ला मगन। कूचियां चल रही हैं, खरांचे चल रहे हैं, दीवार पर पिछले साल लेपी गई मिट्टी ने साथ छोड़ दिया है उसे मिट्टी की नई पोशाक पहनाई जा रही है। गोबर की खुशबू से पूरा घर महक रहा है लोग बेकार ही कहते हैं कि वो बदबू देता है हम लोगों को तो कभी ऐसा नहीं लगा। हम जैसे लोगों का तो होली पर रंग खत्म होने पर यहीं एक आधार होता था जिसके सहारे पूरी होली निभती थी। त्यौहारों के मौके को हम भुनाते नहीं निभाते थे और उससे भी कहीं ज़्यादा जीते थे। ये ऐसी खुशियां होती है जिनको हम साल भर जीते थे। त्योहार बीतने के साथ ही हम इनके सहारे ही फिर अगले साल इनसे कुछ बेहतर की आरज़ू बनाए रखते हैं। वक्त गुज़रने के साथ साथ ये हमारी यादों की कभी न मिटने वाली इबारतों में शामिल हो जाती हैं। ये दीवाली आपकी ख़्वाहिशों को मंज़िल तक ले जाने की रोशनी दे...आपकी ज़िंदगी में खुशियों के दीप जलाए रखे... शुभकामनाएं

Tuesday, October 7, 2008

ग़लत वक़्त, सही फ़ैसला

ये फैसला था एक अंदर ही अंदर टूटते इंसान का, एक जानी-पहचानी लेकिन अनजानी सी लगने वाली फिज़ा के साये एक कभी न टूटने वाली शख़्सियत को रौंदते हुए देखा। लॉर्ड्स की बालकनी से शर्ट निकालकर लहराने वाले इस शख़्स ने भारतीय क्रिकेट को एक अलग चारित्रिक विशेषता में ढलने को मज़बूर कर दिया था। यह विशेषता अपने में समेटे थी एक अलग तरह की आक्रामकता, एक अलग तरह की आग, एक अलग तरह का जोश, जज़्बा, और उन सब से निकल कर 'टीम इंडिया' जिसका रंग इस सदी के शुरुआती दौर में सर चढ़ कर बोला। ख़ैर एक न एक दिन सभी रिटायर होते हैं, हर एक खिलाड़ी को संन्यास शब्द का बोझ लेना ही पड़ता है। एक चीज़ जो एक लंबे दौर तक आपके ज़ेहन में, आपके रग-रग में भरी होती है उसको अलविदा कहना इतना आसान नहीं होता है। सौरव ने भारतीय क्रिकेट को लड़ना सिखाया, जीतना सिखाया और उससे कहीं ज़्यादा वो तेवर दिए जिनके सहारे भी खेल को खेला जाता है और जीता और सिर्फ जीता जाता है। कभी जिन कंधों ने बोतलों, दूसरे खिलाड़ियों का सामान ढोने से मना कर दिया था, भारतीय क्रिकेट टीम की ज़िम्मेदारी उन्हीं कंधों में सबसे मुश्किल हालातों में लिया। ये वो दौर था जब भारतीय क्रिकेट ही नहीं पूरी क्रिकेट की दुनिया मैच फिक्सिंग के जाल में बुरी तरह फंस चुकी थी। सचिन ने कप्तानी छोड़ी, भारतीय क्रिकेट के लिए हालात और भी मुश्किल हो गए। सौरव को सामने लाया गया उन्होंने चुनौती को स्वीकारा और टीम को एक ऐसे दौर में ले गए जिसकी तुलना सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ टीमों से की जाने लगी। लेकिन संन्यास का फैसला ग़लत वक्त पर आया, सौरव को फ़ैसला काफी पहले ले लेना चाहिए था। इसी में सभी की भलाई थी...ख़ैर...सलाम सौरव...

Monday, October 6, 2008

क्या से क्या हो गया...

किसकी नज़र लग गई हमारे अच्छे खासे फूले ताज़े शेयर बाज़ार को। ये अमेरिका वालों ने तो अपनी ऐसी की तैसी कराई ही साथ ही दुनिया भर को लंगड़ा बनाने के माहौल पैदा कर दिये। अपने तो दुनिया भर का पैसा मार कर फिर उन्हीं सट्टेबाज़ों को बचाने में लगे हैं जिन्होंने उसकी अर्थव्यवस्था को चलने के काबिल ही नहीं रखा। अपने यहां भी माहौल कुछ अलग नहीं है। महंगाई हफ्ते-दर-हफ्ते ताल ठोंक कर खड़ी हो जाती है सब्जी लेने बाज़ार निकलो तो गांव से कुछ मील दूर उस हाट की याद आ जाती है , जहां सब्ज़ी के साथ-साथ तमाम आशिर्वाद भी घर ले कर आते थे। अचानक ख़बर आई की सेबी नाम के एक शख़्स ने बाज़ार को तसल्ली देने के लिए पी-नोट्स का जाल फेंका है। बाज़ार से विदेशियों का पैसा धड़ाधड़ निकल रहा है, उसी को रोकने के लिए ये जाल बिछाया है, पिछले साल अक्टूबर में तो बड़ा अकड़ रहे थे कि इतना पैसा आ गया है मैनेज कैसे करेंगे अब लो नक़दी की कमी का रोना रोया जा रहा है। थोड़ी देर बाद रिज़र्व बैंक भी मैदान में कूद पड़ी, झटपट सीआरआर घटा दी, आधा फीसदी के करीब, सिस्टम में 20,000 करोड़ और आ जाएंगे, मज़ा लूटो, और न लूट सको तो कम से कम रोओ तो नहीं। महंगाई की चिंता ताक पर रख दी। बाज़ार के अगर दस्त लगने लगे तो इलाज महंगा हो जाएगा। वैसे भी दस्त लगने से अच्छा है कि भूखों मरो। इसलिए भइया महंगाई धरो एक कोने में बाज़ार की सोचो। अरे, बड़े लोग, बड़ा खेल, और फिर सट्टेबाज़ों का तो हमारे सिवा और कोई नहीं है इस दुनिया में। महंगाई फिर बढ़ेगी तो बढ़ जाने दो, ये तो पब्लिक है थोड़ी देर गरियागी फिर शांत हो जाएगी। वैसे भी हिंदुस्तानियों के भूलने की आदत का कोई जवाब नहीं। गांधी को गांधी के ज़िंदा रहते ही भूल गए। देश आज़ाद हुआ तो उन बुनियादों को भूल गए जिन पर ख़ड़े हो कर वो लड़ाई लड़ी थी। थोड़ा बड़े हुए तो उन लोगों को भूल गए जिनके दम से पूरा देश ज़िंदा रहता है। और थोड़ा सयाने हुए तो उस मिट्टी को भी भूल गए जिसकी ख़ुशबू कभी हममें वो जोश भर देती थी जिसके दम पर हज़ारों सालों बाद भी हम अपने अस्तित्व, अपने संस्कार बचाने में क़ामयाब हुए थे।

Friday, October 3, 2008

सिंगूर...नैनो...टाटा

सुबह से गहमगहमी थी... आखिर रतन टाटा बुद्धदेब भट्टाचार्या से मुलाकात करने वाले थे। 4 बजे शाम को मुलाकात होनी थी। बातचीत हुई...और फिर फैसला... ख़बर तो पहले ही आ गई थी... बस अब सिर्फ औपचारिक ऐलान बाकी था। सवा 6 बजे के करीब रतन टाटा ने ताज होटल में प्रेस कॉन्फ्रेस की। दुखी लग रहे थे टाटा या वे ऐसे रहते हैं या बड़े लोगों का अंदाज़ ही ऐसे ही होता है पता नहीं...बहरहाल दुखी थे। सिंगूर पर बात नहीं बनी...ऐसी सियासत में फंस गए हम... सिंगूर में अब हम नहीं रहेंगे...हालात ऐसे बना दिए गए कि काम करना मुश्किल हो गया था...ज़मीन मामले से हमारा कोई लेना देना नहीं है...ज़मीन कानूनी तौर पर ली गई...निवेश में हुए नुकसान का कोई अफ़सोस नहीं है... बंगाल से नाता टूटा नहीं है... आगे भी पैसा लगाने को तैयार हैं..। ख़ैर रतन टाटा ने जाते जाते ममता को निशाने पर लेने में कोई कोताही नहीं बरती। साथ ही ये भी संकेत दिए कि नैनो के लॉन्च में देरी हो सकती है। नैनो के नए ठिकाने पर भी कोई फैसला नहीं हुआ है। 3-4 राज्यों से प्रस्ताव मिला है (लेकिन बंगाल जैसी रियायतें कहां मिलेगी!)। देश के सभी राज्य भिखमंगों की तरह टाटा के सामने झोली फैलाए खड़े है...हे टाटा जितनी रियायतें चहिए उतनी देने को तैयार है...बिजली भी मिलेगी, पानी भी मिलेगा वह भी सबसे सस्ते दर में। वो तो कानूनों से बंधें हैं... विपक्षियों का दबाव है... नहीं तो बिजली, पानी तो सब मुफ्त... वैसे भी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है बहुतेरे ऐसे हैं जिनके लिए बिजली पानी सब मुफ्त है। और ज़मीन तो पड़ी ही है। नहीं होगी तो छीन कर दे दी जाएगी... किसानी वैसे ही घाटे का सौदा है... पता नहीं इन किसानों को कब अकल आएगी...

Thursday, September 11, 2008

मृत्यु और मुक्तिबोध

मुक्तिबोध की एक कविता

घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, निस्तब्ध वनंतर
व्यापक अंधकार में सिकुड़ी सोयी नर की बस्ती भयंकर
है निस्तब्ध गगन, रोती-सी सरिता-धार चली गहराती,
जीवन-लीला को समाप्त कर मरण-सेज पर है कोई नर
बहुत संकुचित छोटा घर है, दीपालोकित फिर भी धुंधला,
वधू मूर्छिता, पिता अर्ध-मृत, दुखिता माता स्पंदन-हीन
घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, कवि का मन

"ये सब क्षनिक, क्षनिक जीवन है, मानव जीवन है क्षण-भंगुर" ।
ऐसा मत कह मेरे कवि, इस क्षण संवेदन से हो आतुर

जीवन चिंतन में निर्णय पर अकस्मात मत आ, ओ निर्मल !
इस वीभत्स प्रसंग में रहो तुम अत्यंत स्वतंत्र निराकुल
भ्रष्ट ना होने दो युग-युग की सतत साधना महाआराधना
इस क्षण-भर के दुख-भार से, रहो अविचिलित, रहो अचंचल
अंतरदीपक के प्रकाश में विणत-प्रणत आत्मस्य रहो
तुम जीवन के इस गहन अटल के लिये मृत्यु का अर्थ कहो तुम ।

क्षण-भंगुरता के इस क्षण में जीवन की गति, जीवन का स्वर

दो सौ वर्ष आयु होती तो क्या अधिक सुखी होता नर?
इसी अमर धारा के आगे बहने के हित ये सब नश्वर,
सृजनशील जीवन के स्वर में गाओ मरण-गीत तुम सुंदर
तुम कवि हो, यह फैल चले मृदु गीत निर्बल मानव के घर-घर
ज्योतित हों मुख नवम आशा से, जीवन की गति, जीवन का स्वर ।

Thursday, August 14, 2008

जश्ने आज़ादी


साभार: नवभारत टाइम्स

Monday, July 28, 2008

किस्म-किस्म का डर

डर की परिभाषा यह है कि जब हम आत्मविश्वास खो बैठते हैं तो डर की गिरफ्त में आ जाते हैं। किसी को पड़ोसी से डर लगता है, किसी को अपने साथी से डर लगता है, किसी को अंधेरे से डर लगता है तो कोई उजाले से घबराता है। चोर और ईमानदार दोनों को पुलिस से डर लगता है तो पुलिस को सच्चाई, ईमानदारी से डर लगता है। कर्मचारियों को बॉस से डर लगता है तो बॉस को अपनी इमेज से डर लगता है। सार्वजनिक जीवन में पिछले दिनों जो कुछ घटा उसमें डर की किस्में और निखर कर सामने आईं। आतंकियों को डर खत्म होने का डर बना तो शनिवार को बैंग्लूरू और रविवार को अहमदाबाद को अपना निशाना बना दिया। सोमवार को प्रधानमंत्री और सोनिया मैडम अहमदाबाद दौरे पर गईं तो केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल भी उनके साथ थे। खून से सने अहमदाबाद में उस दिन बारिश की वजह से सड़कों पर कीचड़ था। माननीय मंत्री महोदय सफेद वस्त्रों में इस तरह चल रहे थे कि कहीं कपड़ों पर कीचड़ न लग जाए। यह एक विशिष्ट किस्म का डर है। अमर सिंह जी सोनिया के खिलाफ कहे गए कटु वचनों के लिए खुद को शर्मिंदा महसूस किया तो शायद यह मायावती का डर था। इन्हीं अमर सिंह ने मनमोहन सिंह को हत्यारों का सरदार कहा था तो मैडम को कार दान करने की बात कही थी। अब अमर सिंह कहते हैं कि छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी। लेकिन क्या नई कहानी गढ़ने से पुराना डर चला जाता है। खैर ये तो वक्त ही बताएगा। एनडीटीवी इंडिया में अहमदाबाद धमाकों के शिकार एक छोटे बच्चे यश की ज़िंदगी की जंग को देखा तो कबूतरों की कहानी कुमार रवीश की जबानी ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि डर कैसा भी हो अगर जज़्बा है तो मुश्किलों को मात देना कोई बड़ी बात नहीं है। रात के 1 बज रहे हैं और मुझे भी एक विशिष्ट किस्म का डर लग रहा है अपनी ड्रॉपिंग छूटने का इसलिए मैं अब चलता हूं